काम मे परफैक्ट किसे होना चाहिए- ड्राइवर या मैनेजर को?


इस शुक्रवार पीके डगराज की एक टैक्सी मुझे जैसलमेर से जोधपुर ले गई। 285 किलोमीटर का यह फासला तय करने मे चार घंटे लगते हैं| मेंने टैक्सी को सुबह पांच बजे बुलाया था| वह समय पर आ पहुँची| अंधेरे मे शुरुआती 20 मिनट प्रार्थनाएं करने के बाद मैंने ड्राइवर से पूछा कि क्या वह मुझे 10 बजे तक पहुंचा देगा? उसने यह कहकर मुझे इम्प्रेस करने की कोशिश की कि उसने पाक 12 बजे जोधपुर से यात्रा शुरु की थी और ठीक 4 बजे वह जैसलमेर पहुंच गया था, जबकि वापसी मे तो दिन की रोशनी भी होगी| यह सुनकर मैं चौंक गया, क्योंकि वह बिना आराम किए गाड़ी चला रहा था| अलबत्ता राजस्थान मे सड़कें बोहोत अच्छी हैं, लेकिन रास्ते मे मवेशियों या जंगली जानवरों के बीच सड़क पर आ जाने की संभावनाएं रहती हैं| इसके अलावा पैदल तीर्थयात्रियों की संख्या भी इन दिनों अधिक रहती है| जब तक मैं समझ पाता कि मैं असुरक्षित हाथों मे हूं, हम शहर से 35 किलोमीटर दूर आ चुके थे। वापस लौटकर कोई दूसरी गाड़ी लेने के मेरे इरादे पर ड्राइवर के इस कथन से पानी फिर गया कि- मेरे पास डीजल नहीं है। 

सौभाग्य से हमें एक पेट्रोल पंप मिला। हमने पंप वाले को जगाने की कोशिश की। उसे उठने में देर लगी, फिर उसने कंप्यूटर चलाया, पासवर्ड लिखा, तब जाकर पंप करने वाली मशीन चालू हुई। इसमें 30 मिनट खर्च हो गए। मैं अपसेट हो गया और ड्राइवर से कहा कि वे लोग बहुत गैरजिम्मेदार हैं। कोई 25-26 साल के उस ड्राइवर को लगा कि उसने एक रात नहीं सो कर अपने मालिकों के लिए बड़ी कुर्बानी दी है। गैरजिम्मेदार शब्द सुनकर वह मायूस हो गया। जब हम वहां से निकले तो मैंने कुछ अच्छे शब्द कहकर उसे दिलासा देने की कोशिश की। लेकिन उसने एक डिवाइडर से गाड़ी टकरा दी, टायर फट गया और गाड़ी रुक गई। कार की मेरी वाली साइड क्षतिग्रस्त हो गई थी, पर हमें चोट नहीं आई। टायर बदलने हम नीचे उतरे। ड्राइवर के पास स्पेयर-टायर था, पर टूल्स नहीं थे। जब उसने अपने ऑफिस फोन लगाया तो उन्होंने बताया कोई और ड्राइवर टूल्स ले गया है। अब हम बीच सड़क पर खड़े थे और हर वाहन को हाथ दिखा कर रोकने की कोशिश कर रहे थे। आखिर एक मिल्कमैन वहां से गुजरी। उसमें छोटे बच्चे सवार थे, जो किसी गांव के स्कूल जा रहे थे। उन्होंने हमें जैक दिया, लेकिन पाना हमारी टायर के नट पर फिट नहीं बैठ रहा था। दो और गाड़ियां रुकी, पर उनका पाना भी फिट नहीं बैठा, क्योंकि नट घिस चुके थे। तब मेरे ड्राइवर ने जुगाड़ लगाई और पाने में कपड़ा फंसाकर स्क्रू खोले। आखिर 10:15 बजे मैं जोधपुर पहुंचा। पूरे रास्ते में ड्राइवर से बातें करता रहा, ताकि उसकी नींद ना लगे। वह बीच-बीच में गुटखा खाकर भी थूक रहा था और इससे गाड़ी दाएं-बाएं झूल रही थी। 

देश में हर चौथे मिनट सड़क दुर्घटना में एक व्यक्ति की जान जाती है। इसका मतलब है कि हर दिन 360 लोगों की सड़क हादसों में केवल इसलिए मौत हो जाती है, क्योंकि हमारे पास सड़कों पर गाड़ी चलाने के लिए अच्छी स्किल्स नहीं है। सड़क सुरक्षा के उपायों को अपनाने के बाद अब यह आंकड़ा डेढ़ लाख सालाना से घटकर एक 1.31 लाख हो गया है। संयुक्त राष्ट्र की सड़क सुरक्षा परिषद बताती है कि पूरी दुनिया में सड़क हादसों में हर साल 13.5 लोगों की मौत हो जाती है।

फंडा यह है कि एक मैनेजर कुछ स्किल्स को काम करते हुए भी सीख सकता है, क्योंकि उसकी गलतियों से कंपनी के रेवेन्यू को थोड़ा सा नुकसान होगा। लेकिन एक ड्राइवर की गलती से किसी की जान जा सकती है। मैनेजर के बजाय एक ड्राइवर को अपना काम कहीं बेहतर तरीके से आना चाहिए।

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