इस घटना पर थोड़ा चिंतन करें। इसे हम हद की बेइंतेहा ही कहेंगे। इस तरह की घटना पाकिस्तान में ना तो पहली है और ना ही अंतिम।
तालाब और नदी के पानी में काफी अंतर होता है। तालाब का पानी बह नहीं सकता, दूसरी और नदी का पानी लगातार बहता ही रहता है। बहता पानी निर्मल। कालचक्र कभी विपरीत दिशा में नहीं घूमता। इसमें रिवर्स गियर भी नहीं होता। परिणामस्वरूप विचारों में भी बदलाव आते रहते हैं। विचारों की नित्य-नूतनता में ही विचारों के वृंदावन की सुगंध छिपी होती है। कुछ भी अंतिम नहीं होता। फाइनल नहीं होता। यही 'फाइनलिटी' भी मजहब की दुश्मन बन सकती है।
समय के साथ चलते हुए किसी भी मजहब रूपी जलाशय में जमी हुई काई को दूर करने के लिए राजा राममोहन राय, वीर नर्मद, दुर्गाराम मेहता जैसे समाज सुधारक आते हैं। ऐसा ना हो तो धर्म में बासीपन आ जाता है, उसे आसानी से दूर नहीं किया जा सकता। पाकिस्तान जैसे आतंक प्रदेश में भी कुछ लोग ऐसे हैं, जो खुलकर बोलते हैं। इनमें एक व्यक्ति है हसन निसार। मैंने टीवी पर हसन भाई को बारंबार सुना है। यहां पर हसन भाई के कुछ क्रांतिकारी विचारों को रख रहा हूं।
पाकिस्तान ने मिसाइल कार्यक्रम तैयार किया। उसने उसके नाम कैसे रखे? एक का नाम गौरी मिसाइल और दूसरी का गजनी मिसाइल। इतिहास के पन्नों में यह दोनों तो जंगली लुटेरे माने जाते हैं। ऐसे नाम पाकिस्तान की युवा पीढ़ी को किस तरह से प्रेरणा देंगे? पाकिस्तानी शासकों के सुधरने के कोई लक्षण नहीं है। पर हम आम लोग तो इस पर विचार कर ही सकते हैं।
पाकिस्तान में बड़े-बड़े जमींदारों नें जमीनों पर कब्जा जमा लिया है। उनकी संतानें अमेरिका-यूरोप में पक्षिमी शिक्षा प्राप्त कर रही हैं। यह धर्म के नाम पर उत्पात मचा रहे हैं। आप ही बताएं, ऐसे देश का क्या होगा?
भारत पाकिस्तान जैसे दो पड़ोसी देशों के बीच तो अमेरिका कनाडा जैसा संबंध होना चाहिए। भारत-पाकिस्तान के बीच जो सामान्य व्यापारिक संबंध हों, तो दोनों देशों को काफी मुनाफा हो सकता है।
अल्लाह की मेहरबानी है कि उसने हमें सांप, बिच्छू या बिल्ली नहीं बनाया, आदमी ही बनाया। अब इस आदमी से इंसान बनना हमारी जवाबदारी है। आतंकी इंसान नहीं होते। इंसान तो क्या, आदमी ही नहीं होते।
मुझसे मेरे दोस्त बार-बार पूछते हैं, हसन भाई आप ऐसे क्रांतिकारी विचारों को सामने लाते हैं, इससे कई लोग आपसे नाराज हैं। आप को मरने का खौफ नहीं है? तो मेरा जवाब सीधा और सरल है। मेरी उम्र पाकिस्तान में रहने वाले लोगों की अपेक्षा दो दशक अधिक है। मैं औसत उम्र से अधिक जीत चुका हूं, तो फिर अब काहे का डर?
आज पाकिस्तान तबाही के करीब है। गांधी जी के शब्दों में कहें तो पाकिस्तान आज निति-नाश के रास्ते पर है। उन्होंने इन दो शब्दों का अपनी किताब में एक शीर्षक के रूप में प्रयोग किया है। आज पाकिस्तान का अस्तित्व ही खतरे में है। यह देश सर्वनाश की धार पर लटका हुआ है, क्योंकि उसका निर्माण ही धिक्कार और क्रूरता की बुनियाद पर हुआ है।
डेढ़ से दो दशक में पाकिस्तान की उम्र खत्म हो जाएगी। मेरी बात यदी समझ में नहीं आती, तो पाकिस्तान में ही बनी फिल्म 'खुदा के लिए' देख सकते हैं, जिसमें एक प्रगतिशील मुल्ला की भूमिका नसरुद्दीन शाह ने निभाई है। इसी नसीरुद्दीन शाह को 'गांधी माय फादर' नाटक में गांधीजी की भूमिका निभाते हुए देखकर मैं भाव विभोर हो गया था। उनकी स्वाभाविक भूमिका को देखने के बाद उनके आभामंडल से मैं अभी तक मुक्त नहीं हो पाया हूं।
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